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Vivek Mudgal AstrologerVivek Mudgal Astrologer General 23 June 2026 Last updated 23 June 2026

Nirjala Ekadashi 2026: Date, Significance, Water Fasting, Jal Daan, Scientific Benefits & Vishnu Worship

Nirjala Ekadashi 2026 falls on 25 June. Discover its scriptural significance, water fasting, Jal Daan, Bhimseni Ekadashi story, Vishnu worship and scientific benefits.

Nirjala Ekadashi 2026: Date, Significance, Water Fasting, Jal Daan, Scientific Benefits & Vishnu Worship

निर्जला एकादशी 2026: एक व्रत से सभी एकादशियों का फल कैसे मिलता है? जानें शास्त्रीय रहस्य, जलदान का महत्व और वैज्ञानिक आधार

निर्जला एकादशी 2026 कब है?

सनातन धर्म में एकादशी व्रतों का विशेष महत्व है, किन्तु ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार जो साधक वर्ष भर की 24 या 26 एकादशियों का व्रत करने में समर्थ नहीं है, वह केवल निर्जला एकादशी का श्रद्धापूर्वक पालन करके समस्त एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त कर सकता है।

वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा।

इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना, जप, दान और निर्जल उपवास का विशेष विधान है।

मुख्य बातें (Quick Summary)

  • तिथि: 25 जून 2026
  • पक्ष: ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष
  • आराध्य देव: भगवान विष्णु
  • विशेष नाम: भीमसेनी एकादशी
  • मुख्य नियम: जल और अन्न का त्याग
  • विशेष दान: जलपूर्ण कलश, छाता, पंखा, अन्न, वस्त्र
  • विशेष फल: समस्त एकादशी व्रतों के बराबर पुण्य

निर्जला एकादशी का शास्त्रीय महत्व

पद्म पुराण
एकामपि तु यो भक्त्या निर्जलामुपोषितः।
सर्वैकादश्यः फलं तस्य लभते नात्र संशयः॥
हिन्दी अर्थ: जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ निर्जला एकादशी का व्रत करता है, वह सभी एकादशियों का फल प्राप्त करता है।

शास्त्रीय व्याख्या: यह श्लोक निर्जला एकादशी को अन्य एकादशियों से विशेष बनाता है। यहाँ निर्जल उपवास केवल भोजन त्याग नहीं बल्कि मन, इन्द्रियों और इच्छाओं के संयम का प्रतीक माना गया है।

भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है?

महाभारत के अनुसार पाण्डवों में भीमसेन अत्यधिक भोजन करने वाले थे। वे सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें केवल ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जल व्रत रखने का उपदेश दिया। तभी से यह व्रत "भीमसेनी एकादशी" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

निर्जला एकादशी पर जल का त्याग क्यों?

शास्त्रों में जल को जीवन का आधार माना गया है। अन्न का त्याग अपेक्षाकृत सरल है, किन्तु जल का त्याग तप का उच्च स्वरूप माना गया है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण
निर्जलैकादशीं कृत्वा यो नरः केशवप्रियाम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
अर्थ: जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत करता है, वह भगवान केशव का प्रिय होता है और सभी वह पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

व्याख्या: यहाँ जल त्याग का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि आत्मसंयम और भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण है।

निर्जला एकादशी पर जलदान का महत्व

बहुत से लोग पूछते हैं कि जब इस दिन स्वयं जल का त्याग किया जाता है तो दूसरों को जल पिलाने का क्या महत्व है? शास्त्रों के अनुसार निर्जला व्रत का एक महत्वपूर्ण अंग जलदान भी है।

भविष्य पुराण
जलदानं परं दानं सर्वदानमयं स्मृतम्।
तृषितस्य प्रदत्तं हि तत्क्षणादक्षयं भवेत्॥
अर्थ: जलदान श्रेष्ठ दान है। प्यासे व्यक्ति को दिया गया जल अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
स्कन्द पुराण
अन्नदानात्परं दानं जलदानं ततः परम्॥
अर्थ: अन्नदान महान है, किन्तु विशेष परिस्थितियों में जलदान उससे भी बढ़कर माना गया है।

व्याख्या: ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में प्यासे व्यक्ति को जल देना प्राणदान के समान माना गया है।

क्या निर्जला एकादशी पर प्याऊ लगाना शास्त्रसम्मत है?

यद्यपि वर्तमान अर्थ में “प्याऊ” शब्द पुराणों में नहीं मिलता, किन्तु धर्मशास्त्रों में यात्रियों और प्यासे लोगों के लिए जल की व्यवस्था को महान पुण्यकर्म कहा गया है।

महाभारत, अनुशासन पर्व
वापीकूपतडागानां कर्ता स्वर्गे महीयते॥
अर्थ: जो व्यक्ति कुएँ, बावड़ी और तालाब बनवाता है, वह स्वर्ग में सम्मान प्राप्त करता है।

शास्त्रीय निष्कर्ष (जलदान के प्रकार)

  • जल से भरा घड़ा दान करना
  • सार्वजनिक जल वितरण करना
  • प्याऊ लगाना
  • कुआँ, बावड़ी या जलस्रोत बनवाना

ये सभी जलदान की श्रेणी में आते हैं।

एकादशी का वैज्ञानिक महत्व

ऋषियों ने तिथि विज्ञान को केवल धार्मिक आधार पर नहीं बनाया था। आधुनिक विज्ञान के अनेक सिद्धांत एकादशी की परंपरा को समझने में सहायता करते हैं।

1. चन्द्रमा और शरीर का संबंध

मानव शरीर का अधिकांश भाग जल तत्व से निर्मित है। वैदिक परंपरा में चन्द्रमा को मन और जल तत्व का कारक माना गया है। अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास मानसिक और भावनात्मक उतार-चढ़ाव अधिक होते हैं। एकादशी इन दोनों अवस्थाओं के पूर्व आने वाली तिथि है, इसलिए ऋषियों ने उपवास, जप और ध्यान का विधान किया।

2. पाचन तंत्र को विश्राम

जब व्यक्ति उपवास करता है:

  • पाचन तंत्र को आराम मिलता है
  • इंसुलिन का स्तर नियंत्रित होता है
  • ऊर्जा का संरक्षण होता है
  • शरीर मरम्मत प्रक्रिया पर अधिक ध्यान देता है

3. ऑटोफैजी (Autophagy)

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार उपवास के दौरान शरीर पुरानी और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाने की प्रक्रिया सक्रिय करता है जिसे ऑटोफैजी कहा जाता है। यह शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया मानी जाती है।

4. मानसिक एकाग्रता

उपवास के दौरान मन अपेक्षाकृत शांत होता है, ध्यान क्षमता बढ़ती है, आत्मनियंत्रण मजबूत होता है और आध्यात्मिक अभ्यास में गहराई आती है। यही कारण है कि एकादशी केवल भोजन त्याग नहीं बल्कि जप, ध्यान और भक्ति का भी पर्व है।

निर्जला व्रत किसे नहीं करना चाहिए?

धर्मशास्त्रों में व्रत का उद्देश्य आत्मशुद्धि है, शरीर को हानि पहुँचाना नहीं। निम्न व्यक्तियों को चिकित्सकीय सलाह लेकर व्रत करना चाहिए:

  • गर्भवती महिलाएँ
  • वृद्धजन
  • मधुमेह रोगी
  • किडनी रोगी
  • गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति

ऐसी स्थिति में फलाहार या जल सहित व्रत भी किया जा सकता है।

निर्जला एकादशी की पूजा विधि

  1. ब्रह्ममुहूर्त में उठें।
  2. स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन करें।
  3. व्रत का संकल्प लें।
  4. तुलसी दल अर्पित करें।
  5. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  6. दिनभर जप और ध्यान करें।
  7. द्वादशी में विधिपूर्वक पारण करें।

विशेष मंत्र

  • बीज मंत्र: ॐ नमो नारायणाय
  • विष्णु मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
  • विष्णु गायत्री: ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न: निर्जला एकादशी 2026 कब है?
उत्तर: 25 जून 2026, गुरुवार।
प्रश्न: क्या निर्जला एकादशी में पानी पी सकते हैं?
उत्तर: परंपरागत रूप से नहीं, किन्तु स्वास्थ्य कारणों से आवश्यक होने पर जल ग्रहण किया जा सकता है।
प्रश्न: निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
उत्तर: महर्षि वेदव्यास द्वारा भीमसेन को इस व्रत का उपदेश दिए जाने के कारण।
प्रश्न: क्या निर्जला एकादशी पर जलदान करना चाहिए?
उत्तर: हाँ, शास्त्रों में जलदान को महादान कहा गया है।
प्रश्न: क्या प्याऊ लगाना पुण्यदायी है?
उत्तर: हाँ, यह जलदान और लोककल्याण की भावना के अनुरूप है।
प्रश्न: निर्जला एकादशी का मुख्य लाभ क्या है?
उत्तर: समस्त एकादशी व्रतों के समान पुण्य प्राप्ति।

निष्कर्ष

निर्जला एकादशी केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है। यह आत्मसंयम, तप, भगवान विष्णु की भक्ति, जलदान और लोककल्याण का महापर्व है। शास्त्रों में इसे सभी एकादशियों में श्रेष्ठ कहा गया है। इस दिन स्वयं संयम का पालन करना और साथ ही प्यासे लोगों को जल उपलब्ध कराना दोनों ही अत्यंत पुण्यदायी माने गए हैं।

आचार्य विवेक मुद्गल
वैदिक ज्योतिषाचार्य | वास्तु विशेषज्ञ | पराशरी एवं मेदनी ज्योतिष शोधकर्ता

33 वर्षों से ज्योतिष, वास्तु और वैदिक परामर्श के क्षेत्र में सक्रिय। राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर ज्योतिषीय विश्लेषण प्रस्तुत कर चुके हैं तथा भारत एवं विदेशों में हजारों लोगों को ज्योतिषीय मार्गदर्शन प्रदान कर चुके हैं।

Vivek Virat Mudgal — Founder of ViratAstro
Author·Founder · ViratAstro

Vivek Virat Mudgal

Vedic Astrologer · Parashari Jyotish Expert · Vastu Consultant

33+ years of dedicated practice in Vedic Astrology & Parashari Jyotish. Featured on News Nation. Trusted by 33,000+ clients across 14+ countries. All articles on ViratAstro are written and reviewed by Acharya Vivek जी to ensure shastra-shudh accuracy.

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